भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस निष्कर्ष पर पहुँचाने के बाद कि राज्य पुलिस कर्मियों द्वारा कम से कम १६ आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया गया है, इन सभी मामलों में स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए, ऐसा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा। ७ जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने कहा कि उसे अक्टूबर २०१५ और जनवरी २०१६ के बीच दर्ज किए गए, सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ कथित तौर पर किये गए यौन हिंसा के ३ मामलों की जांच करने पर बलात्कार, यौन और शारीरिक हिंसा के प्रथम दृष्टया सबूत मिले हैं । इस जांच के आधार पर आयोग ने राज्य सरकार को मानव अधिकारों के घोर उल्लंघन के लिए ‘परोक्ष तौर पर जिम्मेदार’ पाया है।

“छत्तीसगढ़ पुलिस आदिवासी महिलाओं द्वारा दायर की गयी यौन हिंसा की शिकायतों पर कार्रवाई करने में सुस्ती बरत रही है,” गोपिका बाशी, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की महिला अधिकार कार्यकर्ता, ने कहा।

“एनएचआरसी के यह जांच निष्कर्ष सार्वजनिक होने के बाद सरकार की नींद टूटनी चाहिए । इन सभी मामलों में एक स्वतंत्र जांच का होना ख़ास तौर पर इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इन शिकायतों के आरोपितों में पुलिस और सुरक्षा बलों के सदस्य भी शामिल हैं। सैन्य अभियानों के दौरान यौन उत्पीड़न को सामरिक उपकरण बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। “

दायर किये गए तीनों में से किसी भी मामले में अभी तक आरोप पत्र दाखिल नहीं किये गए हैं । एनएचआरसी ने यह भी पाया कि इन तीन मामलों के कुछ पीड़ितों के बयान अभी तक दर्ज नहीं किये गए हैं । एनएचआरसी ने यह भी कहा है की इनमें से किसी भी मामले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम -जो की दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए बनाया गया कानून है- के तहत केस दर्ज नहीं किये गए हैं ।

ईशा खंडेलवाल, जो पीड़ितों की सहायता करने वाली एक वकील हैं, ने कहा, “जांच में जानबूझकर देरी की जा रही है। कार्रवाई करने का पूरा दारोमदार राज्य सरकार पर है । सरकार किसका इंतज़ार कर रही है? इसे एक व्यापक सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए - इन क्षेत्रों में पुलिस कार्रवाई में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों को एक स्तर की दंड-मुक्ति दी गयी है । “

१ नवंबर २०१५ को, तीन आदिवासी महिलाओं और एक लड़की ने एफ.आई. आर (प्रथम जांच रिपोर्ट) दर्ज कराई जिसमें सुरक्षा बलों के खिलाफ, १९ और २४ अक्टूबर २०१५ के बीच बीजापुर जिले के पांच गांवों में बलात्कार और यौन हिंसा करने का आरोप लगाया गया । १५ जनवरी २०१६ को, छह आदिवासी महिलाओं ने एफ.आई. आर (प्रथम जांच रिपोर्ट) दर्ज कराई जिसमें सुरक्षा बल के जवानों के खिलाफ १२ जनवरी को सुकमा जिले के कुन्ना और पेडापारा गांवों में तलाशी अभियान के दौरान कथित तौर पर यौन उत्पीडन करने का आरोप लगाया गया। एक और एफ.आई. आर २१ जनवरी २०१६ को दर्ज कराई गई जिसमें सुरक्षा कर्मियों के ख़िलाफ़ ११ और १४ जनवरी के बीच बीजापुर स्थित नेन्द्रा में तलाशी अभियान के दौरान एक दर्जन से भी अधिक महिलाओं के साथ कथित तौर पर बलात्कार करने का आरोप है ।

मई २०१६ में, भारत के राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने इन मामलों में की जा रही जांच को ‘असंतोषजनक’ ठहराया था और साथ ही साथ यह भी कहा था की उन सुरक्षा कर्मियों की पहचान करने में कोई प्रगति नहीं हुई है जिनपे ग्रामीणों पर हमला करने का संदेह है । आयोग ने यह सिफारिश की है कि जांच राज्य पुलिस की किसी और दस्ते को सोंप दी जाए । कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने भी महिलाओं के साथ हुई शारीरिक और यौन हिंसा के तीन मामलों के ब्यौरों दर्ज किया है।

“इन सभी मामलों में, राज्य पुलिस ने एफ.आई. आर (प्रथम जांच रिपोर्ट) दर्ज करने से पहले साफ़ इनकार किया और काफी देरी के बाद ही ऐसा करने के लिए सहमत हुए। भारतीय कानून के तहत, यौन हिंसा के मामले में एफ.आई. आर (प्रथम जांच रिपोर्ट) दर्ज करने से इनकार करना एक दण्डनीय अपराध है। पुलिस को उनकी निष्क्रियता के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, ” गोपिका बाशी ने कहा।

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