२०१३ के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद दायर किये गए सामूहिक बलात्कार के सात मामलों की तेजी से जांच करने, उनमें अभियोजन की कार्यवाई शुरू करने और न्याय दिलाने में उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज प्रकाशित एक नयी रिपोर्ट में कहा।

यह रिपोर्ट, जिसका शीर्षक “टूटता विशवास : न्याय के लिए मुजफ्फरनगर सामूहिक बलात्कार पीड़ितों का संघर्ष” है, उन सात मुसलमान महिलाओं के संघर्ष का विवरण देती है जिन्होंने सितंबर २०१३ के दंगों के बाद आगे आके अपने साथ जाट समुदाय के पुरुषों द्वारा किये गए सामूहिक बलात्कार के बारे में रिपोर्ट दर्ज़ कराई थी।

दंगों के बाद के इन तीन साल के दौरान, इनमें से किसी भी मामले में किसी व्यक्ति को सजा नहीं हो पायी है। २०१३ में हुए भारत के कानूनों में परिवर्तन, जिनके अन्तर्गत बलात्कार के मामलों में मुक़दमा बिना किसी अनावश्यक देरी के जल्द से जल्द पूरा हो जाना चाहिए, उसके बावजूद इन मामलों के मुक़दमे बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं । राज्य सरकार और एक के बाद एक आने वाली केंद्र सरकारें, पीड़ितों की धमकी और उत्पीड़न से पर्याप्त रूप से रक्षा करने में - जिसकी वजह से कुछ मामलों में पीड़िताओं ने अपने बयान वापस भी ले लिए हैं -और पर्याप्त मुआवजा और क्षतिपूर्ति प्रदान करने में विफल रही है ।

“यह सात महिलाएं, जो भारी मुश्किलों का सामना करके अपने मुकदमों को लड़ रही हैं, उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में उत्तर प्रदेश सर्कार पूर्ण रूप से नाकाम रही है,” आकर पटेल, कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा। “इन मामलों में न्याय दिलाने में प्रतीत होता हुआ सर्कार की मंशा का अभाव, २०१३ में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए दण्ड-मुक्ति को समाप्त करने के लिए पारित किये गए कानूनी सुधारों की भावना के खिलाफ जाता है।”

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने, जुलाई २०१६ और जनवरी २०१७ के बीच, सामूहिक बलात्कार के उन सात पीड़ितों, जिन्होंने सामने आके प्राथमिकी दर्ज कराई थी, उनमें से छह का साक्षात्कार किया। सभी सात सामूहिक बलात्कार के मामले में पुलिस ने आरोपों को दाखिल करने के लिए महीने लगा दिए, और अंततः यह करने के बाद भी , इन मामलों में मुक़दमे अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़े हैं । यहां तक कि जिन मामलों में पुलिस ने आरोप पत्र दायर कर दिए थे - जिसमें ज्यादातर मामलों में ६ से १४ महीनों का समय लगा - उनमें भी मुकदमें तुरंत शुरू नहीं किये गए।

तीन मामलों में पीड़िताओं ने दाखिल की गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट में उन पुरुषों का नाम दर्ज़ कराया था और पहचान भी की थी जिन्होंने पीड़िताओं के अनुसार उनके साथ बलात्कार किया था, लेकिन फिर अदालत में अपने बयान से मुकर गयीं । उनमें से कुछ ने बाद में स्वीकार किया कि उन्हें ऐसा करने के लिए इसलिए मज़बूर होना पड़ा क्योंकि उनकी और उनके परिवारों की सुरक्षा लगातार मिल रही धमकियों और दबाव की वजह से ख़तरे में पड़ गयी थी और इसका कारण अधिकारियों की तरफ से पर्याप्त समर्थन और सुरक्षा के इंतज़ाम की कमी भी था ।

“हम अभी भी घर से निकलने पर डर महसूस करते हैं,” एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को पीड़िताओं में से एक ने बताया ।

मानवाधिकार वकील वृंदा ग्रोवर, जो सुप्रीम कोर्ट में पीड़िताओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, ने कहा, “हम कह रहे हैं कि हाँ, आपको खड़ा होना चाहिए अदालत में, बलात्कार के मुक़दमे में सबूत देना चाहिए और आपकी गरिमा की पुष्टि होनी चाहिए। लेकिन उसके लिए उस महिला को क्या करना होगा? उसे या तो अपने या अपने बच्चों के या परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन को तक दाँव पर रखना होगा।”

राज्य पुलिस ने भी, सितंबर व अक्टूबर २०१३ और फरवरी २०१४ में दर्ज की गयी प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता धारा ३७६ (२) (जी), जो सांप्रदायिक या जातीय हिंसा के दौरान बलात्कार के अपराध को विशेष रूप से मान्यता देती है, उस धरा के अन्तर्गत अपराध दर्ज नहीं किये थे। प्राथमिकी दर्ज करने में, चिकित्सा परीक्षा आयोजित करने में और मजिस्ट्रेट के समक्ष पीड़िताओं के बयान दर्ज करने में भी देरी की गयी थी।

सभी सात पीड़िताओं को, उनके रोज़गार और आजीविका पूर्णतः क्षतिग्रस्त होने के बावज़ूद, अपने जीवन के पुनर्निर्माण के लिए, अधिकारियों की ओर से ना के बराबर सहायता प्राप्त हुई है। कई परिवारों को सुरक्षा के लिए नियुक्त किये गए कांस्टेबल को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था खुद ही करनी पड़ी है ।

“उत्तर प्रदेश की नई सरकार, जो मार्च में कार्यभार संभालेगी, को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन सभी मामलों में जांच और अभियोजन की कार्यवाई सख्ती के साथ और बिना किसी अनुचित देरी के साथ की जाये और पीड़िताओं को पूरा मुआवज़ा और क्षतिपूर्ति प्रदान की जाए । केंद्र सरकार को सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम और उसके बाद की उचित सरकारी प्रतिक्रिया को निर्धारित करने के किये एक नया क़ानून पारित करना चाहिए और एक व्यापक पीड़ित और गवाह संरक्षण कार्यक्रम की स्थापना भी करनी चाहिए, “आकर पटेल ने कहा।

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