पेलेट शॉटगन, जो कश्मीर में सैंकड़ों लोगों को अँधा करने, जान से मारने और आघात पहुँचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं, उनपर तुरंत प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज “लूसिंग साइट इन कश्मीर: इम्पैक्ट ऑफ़ पेलेट फायरिंग शॉटगन्स” शीर्षक वाली एक नई ब्रीफिंग में दोहराया।

ब्रीफिंग में उन ८८ लोगों के मामलों को प्रस्तुत किया गया है जिनकी नजरें, २०१४ और २०१७ के बीच, जम्मू और कश्मीर पुलिस (जेकेपी) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) द्वारा उपयोग में लायी गयी पंप-क्रिया वाली शॉटगनों से दागे गए धातु-निर्मित पेलेट्स से क्षतिग्रस्त हुई थीं।

“अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कश्मीर में बदलाव बंदूक या अपशब्दों से नहीं आएगा - ‘ना गोली, ना गाली’ | यदि सरकार का वाकई में ऐसा मानना है, तो उन्हें पेलेट शॉटगनों का इस्तेमाल बंद करना चाहिए, जो कश्मीर में अत्यंत पीड़ादायक रहा है,” एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक, आकार पटेल ने कहा।

“प्राधिकारी यह दावा करते हैं कि पेलेट शॉटगन घातक नहीं है, लेकिन इस क्रूर हथियार के कारण होने वाली चोटों और मौतें इस बात का प्रमाण हैं कि यह हथियार कितना खतरनाक, बेसटीक और अंधाधुंध है। इन पेलेट शॉटगनों को इस्तेमाल करने का कोई उचित तरीका नहीं है | अधिकारियों को इन शॉटगनों द्वारा हो रहे नुकसान की जानकारी होने के बावजूद भी इनके उपयोग को जारी रखना गैर-जिम्मेदाराना है।”

पेलेट शॉटगनों से घायल लोगों को मनोवैज्ञानिक आघात के लक्षणों सहित गंभीर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य-सम्बंधित समस्याओं का सामना करना पड़ा है। स्कूल और विश्वविद्यालय के छात्रों जिनकी आँखों में पेलेट्स आकर लगे थे उनका कहना है कि वे पढ़ने में कई कठिनाइयां का सामना कर रहे हैं। कई पीड़ितों को, जो अपने परिवारों के मुख्य कमाऊ सदस्य थे, उन्हें डर है कि वे अब और काम नहीं कर पाएंगे। एक से ज़्यादा ऑपेऱशनों से गुज़रने के बावजूद बहुत से लोग अपनी आँखों की रोशनी वापस नहीं पा पाये हैं |

“कुछ मामलों में, पेलेट शॉटगनों से घायल होने वाले लोगों की खोपड़ी की हड्डी में, आँखों के नज़दीक अभी भी धातु-निर्मित पेलेट्स धंसे हैं। आँखों पर होने वाले संभावित असर के दर से डॉक्टर इन पेलेट्स को निकालने से घबरा रहे हैं, पर उन्हें भी यक़ीनन मालूम नहीं के इसके दीर्घकालिक प्रभाव क्या होंगे,” ज़हूर वानी, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के वरिष्ठ प्रचारक ने कहा |

“दुर्भाग्य से, केंद्र सरकार ने पेलेट शॉटगनों के बारे में जानकारी के लिए किये गए अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया है। यह साफ़ तौर पर मालूम नहीं है कि क्या इन शॉटगनों की ठीक तौर पर जांच की गई है, क्या इनके प्रभावों और खतरों का आकलन किया गया है, या क्या इनके उपयोग से सम्बंधित कोई नियमावली भी है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस हथियारों से हुए घायल और विकलांग लोगों को मदद मुहैया करने के किये ना के बराबर कदम उठाये हैं।”

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी से पता चलता है कि सुरक्षा बलों द्वारा इन निहित रूप से बेसटिक, पेलेट शॉटगनों के उपयोग ने सुरक्षा बल के अन्य कर्मियों को भी घायल किया है। २०१६ में कुपवाड़ा में जम्मू और कश्मीर सशस्त्र पुलिस के कम से कम १६ जवानों को पेलेट्स से लगी चोट का इलाज किया गया था। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने अधिक जानकारी के लिए जेकेपी और सीआरपीएफ को लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

“लोक व्यवस्था बनाये रखना अधिकारियों का कर्तव्य है, लेकिन पेलेट शॉटगनों का उपयोग इसका समाधान नहीं है,” आकार पटेल ने कहा। “सुरक्षा बालों को प्रदर्शनकारियों द्वारा पथराव या अन्य हिंसा से निपटने के लिए उन तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए जिनमें निशाना साधने की ज़्यादा सटीकता हो या होने वाली क्षति पर अधिक नियंत्रण पाया जा सके।”

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया, केंद्र सरकार और जम्मू और कश्मीर राज्य सरकार से अनुरोध करता है कि पेलेट शॉटगनों का इस्तेमाल तुरंत बंद हो और सभी अन्य हथियारों का इस्तेमाल, बल के उपयोग से सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हो। पेलेट शॉटगनों से हुए घायलों और मृतकों के परिवारजनों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पूर्ण क्षतिपूर्ती प्रदान की जानी चाहिए।

उन सभी घटनाओं में जहाँ पेलेट शॉटगन के इस्तेमाल की वजह से मौत हुई है या गंभीर चोटें आयी हैं, यह निर्धारित करने के लिए कि मनमाने या अत्यधिक बल का प्रयोग हुआ है या नहीं, जम्मू-कश्मीर सरकार को एक तात्कालिक, स्वतंत्र और निष्पक्ष असैनिक आपराधिक जांच शुरू करनी चाहिए और जहां पर्याप्त सबूत मिलते हैं, उन मामलों में संदिग्धों पर असैनिक अदालतों में कार्यवाही करनी चाहिए|

अतिरिक्त जानकारी

कम से कम २०१० से, कश्मीर घाटी में सुरक्षा बालों द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट शॉटगनों का इस्तेमाल किया गया है| यह शॉटगन सैकड़ों धातु-निर्मित पेलेट्स दागती है जो एक विस्तृत क्षेत्र में छितरा जाते हैं| पेलेट्स की पथरेखा या दिशा को नियंत्रित करने का कोई तरीका नहीं है, जिसकी वजह से इनका प्रभाव अंधाधुंध रूप से होता है। इन हथियारों के इस अन्तर्निहित स्वभाव के कारण, निशाना बनाये गए लोगों के साथ ही साथ अन्य लोगों को भी गंभीर और स्थायी चोट लगने का अत्याधिक खतरा रहता है। इन खतरों को नियंत्रित करना वस्तुतः असंभव है|

पेलेट शॉटगन का उपयोग, खासकर कि जिस तरह से उनका इस्तेमाल कश्मीर में किया गया है, सैन्य शक्ति के इस्तेमाल पर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन करता है, जिनके अनुसार कानून लागू करने वाले अधिकारी बल का इस्तेमाल कर सकते हैं “सिर्फ तब ही जब बिलकुल जरूरी हो और उस हद तक जहाँ तक उनके कर्तव्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हो”| बल और आग्नेयास्त्रों के उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांत कहते हैं कि बल का उपयोग तब किया जाना चाहिए जब यह उपयोग अपरिहार्य हो, और कानून लागू करने वाले अधिकारियों को बल प्रयोग करने में “संयम का प्रयोग” करना चाहिए और “कम से कम क्षति और चोट पहुँचाने” के प्रयास करने चाहिए|

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