केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती के बयान, कि उन्होंने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान बलात्कार मामले के संदिग्धों को यंत्रणा देने के आदेश दिए थे, के आधार पर मध्य प्रदेश सरकार को जांच का आदेश देना चाहिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने आज कहा।

“ऐसा प्रतीत होता है कि उमा भारती समझती हैं कि वह कानून से ऊपर हैं और उनका यह बयान महिलाओं के खिलाफ हिंसा से लड़ने के उनके संकल्प को परिलक्षित करता है । लेकिन उनके बयान न सिर्फ पथभ्रष्ट हैं बल्कि खतरनाक भी हैं, ” आकार पटेल ने कहा।

“यातना देना हमेशा एक अपराध होता है, और कभी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। उमा भारती के बयान की जांच करना मध्य प्रदेश सरकार के अधिकारियों का कर्तव्य है। अगर उन्हें पर्याप्त स्वीकार्य सबूत मिलते हैं जो उमा भारती के बयान में बताई गयी घटना के वाकई में होने की पुष्टि करते हैं तो उमा भारती और घटना में शामिल अन्य अधिकारीयों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए ।

१० फरवरी को, आगरा, उत्तर प्रदेश में एक चुनावी रैली में उमा भारती ने एक मामले के संबंध में, जिसमें बलात्कार के संदिग्ध तीन लोगों को हाल ही में जमानत पर रिहा कर दिया गया, उसके सन्दर्भ में राज्य सरकार की आलोचना की थी । उन्होंने कहा, “जो लोग इस तरह के अपराध करते हैं उन्हें पीड़ितों के सामने उल्टा लटकाकर, मार-मारकर, चमड़ी उधेड़कर, उस मांस में नमक और मिर्च भर देना ताकि वे तड़पे और उनको तड़पता हुआ देखे वो माएँ और बहनों जो इनके जुर्म की शिकार हुई हैं । इन्हें तड़पना चाहिए और अपनी ज़िन्दगी की भीक मांगनी चाहिए...”

“मैंने ऐसा करवाया था जब मैं मुख्यमंत्री (दिसंबर २००३ से अगस्त २००४ तक) थी और एक महिला के साथ बलात्कार हुआ था। मैंने ऐसा करवाया था । मुझे पुलिस अधिकारियों नें कहा था कि मानवाधिकारों का हनन हो जाएगा। मैंने कहा कि दानवों का मानवाधिकार नहीं होता है । और मैंने आदेश दिया था कि खिड़की से दिखाना इन लड़कियों को कि अंदर क्या हो रहा है और पुलिस अधिकारियों को कहा था कि इन पुरुषों को उल्टा लटका के मारना और इतना मारना कि इनकी चीखें जब उन लड़कियों के कान तक जाएंगी तब इन लड़कियों की आत्मा ठंडी होगी और शांति मिलेगी। “

उमा भारती ने बाद में इंडियन एक्सप्रेस अखबार को लिखे एक पत्र में कहा: “मैं उन पुलिसकर्मियों के नामों का खुलासा नहीं करूंगी जो मेरे ही निर्देशों पर काम कर रहे थे। मैं परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहूंगी और अगर भविष्य में मौका मिला तो फिर से ऐसा करूंगी...लड़कियों के साथ उत्पीडन और बलात्कार करने वालों के प्रति मेरी कोई दया भवन नहीं हैं क्योंकि में उनको इंसान नहीं समझती । इसलिए, वे किसी भी मानव अधिकार के हकदार नहीं है ...यह मामला इतना गंभीर और विशाल है कि मैं ११ मार्च तक इस पर कोई बहस नहीं करना चाहती (११ मार्च को राज्य में हुए चुनावों के परिणामों की घोषणा की जाएगी)। “

यातना और पुलिस हिरासत में अन्य किस्म के दुर्व्यवहार भारत में बड़े पैमाने पर होते हैं, लेकिन शायद ही कभी दंडित किये जाते हैं। हालाँकि यातना को भारतीय कानून के तहत एक अपराध के रूप में विशेष रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों के ज़रिये यह ठहराया है कि यातना और अन्य दुर्व्यवहार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

यातना और अन्य दुर्व्यवहार पर पूर्ण निषेध, प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत आने वाला नियम है, जिसका पालन सभी देशों के लिए अनिवार्य है। यातना उन प्रावधानों का भी उल्लंघन करती है जो नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध, जिसका भारत भी एक हस्ताक्षरकर्ता है, के अन्तर्गत आते हैं । भारत ने, यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन पर भी हस्ताक्षर किए हैं, और बार-बार उसे बहाल करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी जताई है। अतः जब भी यातना या अन्य दुर्व्यवहार करने का संशय हो तो सरकार का दायित्व बनता है कि एक तात्कालिक, विस्तृत और निष्पक्ष जांच कराई जाए ।

“बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ होने वाली अन्य हिंसा भारत में एक गंभीर मुद्दा है, और इन्हें करने वाले अपराधियों को अवश्य दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन इसे कानून के दायरे के अंदर किया जाए, “आकार पटेल ने कहा। “राजनेता तय नहीं कर सकते कि कुछ लोग मानव अधिकारों के हक़दार नहीं है।”

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