हाल ही में आये फैसले, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने १९८९-९० में जम्मू-कश्मीर में घटित २१५ मामलों को जिनमें ७०० से अधिक कश्मीरी पंडित मारे गए थे, दोबारा खोलने से इंकार किया है, उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अस्मिता बासु, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की प्रोग्राम डायरेक्टर, ने कहा:

“सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय जम्मू और कश्मीर में न्याय और जवाबदेही के लिए एक झटका है। स्वतंत्र सरकारी अधिकारियों द्वारा अवैध हत्याओं के सभी आरोपों की जांच की जानी चाहिए और जिम्मेदार लोगों को न्यायपरक सज़ा होनी चाहिए। “

“हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में १९७९ की अवधि में घटित कथित गैर-न्यायिक हत्याओं के ८० मामलों में स्वतंत्र जांच का निर्देश दिया था, जिसमें कहा गया था कि कालातीत हो जाने के कारणवश अपराधों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। मानव अधिकारों के कथित हनन के सभी मामलों में यह सिद्धांत लागू किया जाना चाहिए।”

२४ जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने चार-पंक्ति के आदेश द्वारा २१५ मामलों को फिर से खोलने की याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था: “... २७ साल से अधिक समय बीत चुका है...इतने समय के बाद सबूतों के उपलब्ध होने की संभावना कम होने के कारण कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं प्राप्त होगा|”

पृष्ठभूमि

१९९० के दशक के शुरूआती वर्षों में, सशस्त्र दलों ने हिंदू अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्यों पर कई हमले किए थे, जिससे सैकड़ों हजारों को कश्मीर से पलायन करना पड़ा था।

२००८ में जम्मू और कश्मीर पुलिस की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि १९८९ के बाद से राज्य में २०९ कश्मीरी पंडितों की हत्या की गई, लेकिन इन आरोपों के केवल २४ मामले दर्ज किए गए। कई मामलों में जहां कश्मीरी पंडितों की संदिग्ध सशस्त्र दलों के सदस्यों द्वारा हत्या की गयी थी - जैसे कि २००३ में नादीमार्ग, शोपियान में २४ कश्मीरी पंडितों की हत्या - उनमें किसी को भी सज़ा नहीं हुई है।

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स्मृति सिंह

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